श्री सत्यनारायण व्रत कथा”     ( गढ़वाली म  )

कृष्ण कुमार ममगाईं

 

श्रीमान भीष्म कुकरेती जी का ईं कथा थैं publish करना का सुझाव (face book comment in Group – उदयपुर-ढांगू ” मेरी जन्मस्थली” ) का संदर्भ मा पूरी कथा गढ़वाली छंद म फेस बुक पटल पर प्रस्तुत कन्नु छौं । प्रस्तुति थैं फ़ेसबुक पर संकलन करना हेतु मेरी बिटिया रेणुका मैठानी (ग्राम झैड़) कू स्प्रेम आभार। )

 

श्री सत्यनारायण व्रत कथा (संक्षिप्त गढ़वाली अंक)

ध्यान एवं पूजा :

ॐ श्री गणेशायः नमः ।

श्री नादबुद भैरवायः नमः ॥

ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी

भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च,

गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव:

सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तुः ।।

ॐ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तम् येन चराचरम

यत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ।

श्री सत्यनारायण व्रत कथा – गढ़वाली

प्रथम अध्याय:

शुभ घड़ी एक दिन नैमिशारण्य मां

पुछदना शौनकादिक ऋषी सूत मां ॥

क्या कथा वरत क्या नेम धर्म ह्वलो

पाप संसार को जां से कुछ कम ह्वलो ॥

बोलि सूतन कथा जो कही विष्णु ना

घूमि नारद गई छौ जबरि धाम मां ॥

होया खुश विष्णु नारद से सब सूंणि की

अर बता सब कथा सत्य–नारैंण की ॥

जू करलु ईं कथा छल कपट छोड़ि की

पालु सुख शांति ये लोक परलोक की ॥

पुछद नारद कि कनु वरत, क्या रीत चा

कैन कैरी किलै वरत, क्या मीलि चा ॥

ब्वल्द भगवान यां से खतम हूँद सब

सोक संताप, हर डौर हर रोग चा ॥

पूरि हूंदा सभी इच्छा सौभाग्य की

चाहे सन्तान, धन धान्य कल्याण की ॥

हूंद पूरी जबरि जै कि मनकामना

वरत भक्ती से कैरा तई साम मां ॥

पिंजरि सवया चढ़ै घौर बांमण बुलै

सूंणा सुन्दर कथा सत्यनारैण की ॥

कैरा कीर्तन भजन सब्बी भै-बन्ध गण

सुमिरा भगवान थैं कैरा सब शांत मन

इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे

श्री सत्यनारायण ब्रत कथा प्रथमोध्याय समाप्त ॥

अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्

जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।

श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्

कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥

दूसरा अध्याय:

कैरि कैना कथा पैलि सुण आज यो

काशिपुर मां छौ बांमण स्यु निरधन बड़ो ॥

देखि नी साक्यो दुख तैकु भगवानना

बुढ्या बांमण बणीं बोलि नारैणना ॥

घुमदि दुख मां किलै सुद्दि गंगजांणु छै

कत्था नारैण की क्यों तु करदू नि छै ॥

फिर बता सब नियम फल धरम बरत का

अर बतै सब मेरू द्यबता ह्वा लापता ॥

फिकर से उंणदो पापी रहे रात भर

किरपा नारैण की भीख चौगुणि मगर ॥

फिर कथा कैरि अर सदनि करदू रया

अर कथा कैरि कैरि कि बैकुन्ठ गा ॥

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पूछि सौनक ऋष्युन फेर श्री सूत मां

कैरि कै कैन यो बरत संसार मां ॥

सूंणा विष्णु का मुख की कहीं सूत की

अर रचीं कृष्ण की च फलीं दूब सी

एकदां जब स्यु बांमण घणां ऐश मां

छौ कनू कत्था भै बन्धु का बीच मां ॥

प्यासु आया लकड़हारु तै द्वार पर

लेकि आनन्द परसाद गा घार पर

भोल करना कथा तैन प्रण यो करे

बिठगि लखड़ौं कि ब्यचणां कु सिर मां धरे ॥

किरपा नारैण की ह्वा कमाई डबल

भोग परसाद ले की कथा का सकल ॥

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यां का परताप से पुत्र सन्तान पा

ख्याति बैभव करी ऐश बैकुन्ठ गा ॥

इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे

श्री सत्यनारायण ब्रत कथा द्वितीयोध्याय समाप्त ॥

अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्

जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।

श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्

कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥

तीसरा अध्याय:

भद्रशीला नदी को किनारो छयो

राजा राणी दगड़ि उल्लकामुख छयो ॥

छा कना कत्था सी सत्यनारैण की

आया लाला तबरि एक कक्खी बटी ॥

तैन सूंणी कथा पाय परसाद चा

पूछि क्या वरत अर यांकु क्या अर्थ चा ॥

पुत्र पांणू कनू छौं बता राजना

ईं कथा से उ मिलदा जु नी भागमां ॥

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पकड़ि नौका अपड़ि लाला गा घार कू

जिकुड़ि अकतांणि छै जननि मां ब्वनु कू ॥

छै नि सन्तान तैकी न आशा रती

नाम छौ तैकि पत्नी को लीलावती ॥

ब्वल्द सैरी कथा करद उचणो भलो

ह्वैलि सन्तान फिर मी भि कत्था कलो ॥

सूंणि भगवानना आश बच्चा कि ह्वा

माह दस बाद इक नौनि ना जन्म पा ॥

नौनि कल्लावती छै बढ़दि रात दिन

ब्वलद मां नामकरणा कि पूजा का दिन ॥

उचणो धरयूं छयो कामना पूर्ण ह्वा

सत्यनारैण को बरत अब कैरि द्या ॥

लाला लाला छयो खर्च कनमा कदो

ब्वलद ब्यो का समय ईं का कत्था कलो ॥

बीत्या दिन नौनि होया जवान जबा

भेजि इक दूत ब्यो खोजणा को तबा ॥

लाला कंचनपुरा को मिली एक गा

फिर दमोदांणि ब्यो की भि झट बाजि गा ॥

सौदाबाजी से भगवान नाराज छा

पूजा करना कु ये वक्त स्यू बिसिरी गा ॥

लालाजी अर जवांई चल्या तब खुशिम

कैरि ब्यापार इक नगरि रत्नापुरिम ॥

राजा तैकू छयो चन्द्रकेतू भलो

दैव परकोप राजा को डाका पड़्यो

चोर सब राज को धन उठाई लया

रांदु जख लाला तख छोड़ि सब भागि ग्या ॥

लीग्या पकड़ी सिपै राजा का तौं दुयुं

अर उठै लाया सामान तौंकू ज्वड़यू

यख त रुंदन दुई जेलु की सीख मां

वख त घौरम डकैती पड़ी बीच मां ॥

घर मां लीलावती नौनि बुक्की रया

भीख मंगदा भिखारी उ दर दर गया ॥

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एक दिन जब कला भीख कू जांणि छै

रस्ता बामण का घर मां कथा हूंणि छै ॥

पंहुचि घर देर से वा कथा सूंणि की

पूछि मांन किलै देर मूं आंणि छै ॥

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सुणद ही वरत की बात आ होश मा

छौ धरयूं हमना उचणों कभी जोश मा ॥

हैंका दिन स्वारा भार्यूं सहित स्या दुखी

करद नारैण को वरत हूंणूं सुखी ॥

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मंगद अपणों पती अर पती बेटि कू

करलु फिर वरत मेरा मिली जाला जू ॥

सत्यनारैण इतगा मां ही खुश होया

चन्द्रकेतू उ राजा का सुपन्या गया ॥

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राजा थैं अपड़ि गलती कु अहसास ह्वा

वैन धन धान्य देकी सि द्वी छोड़ि द्या ॥

खुलनि बेड़ी मिल्यो माल मय सूद का

छन इ किस्सा वे नारैण का रूप का ॥

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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे

श्री सत्यनारायण ब्रत कथा तृतीयोध्याय समाप्त: ॥

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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्

जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।

श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्

कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥

 

 

चौथा अध्याय:

 

ह्वैकि खुश द्वी का द्वी जब चल्या घौर कू